हल्द्वानी। जंगलों से निकलकर गुलदार अब आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार डेरा डाल रहे हैं। पहाड़ से लेकर मैदान तक ऐसे मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कारण हैं, जिनमें बाघ का दबाव, गुलदारों की बढ़ती संख्या और आबादी के आसपास आसानी से उपलब्ध भोजन व सुरक्षित ठिकाने प्रमुख हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगल के कोर एरिया में बाघों की मौजूदगी के कारण गुलदार बाहरी क्षेत्रों की ओर आने को मजबूर हो रहे हैं। वहीं, हाल के वर्षों में प्रदेश में गुलदारों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2022 की गणना के अनुसार उत्तराखंड में तीन हजार से अधिक गुलदार थे। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में उनकी संख्या इससे काफी अधिक हो चुकी है। इसके चलते उनके बीच क्षेत्रीय वर्चस्व (टेरिटरी) को लेकर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है।
दूसरी ओर, वन क्षेत्रों से सटे आबादी वाले इलाकों में खाली प्लॉटों और घरों के आसपास उगी घनी झाड़ियां गुलदारों को प्राकृतिक आवास जैसा वातावरण उपलब्ध करा रही हैं। यहां उन्हें पानी, सुरक्षित ठिकाना और कुत्तों सहित अन्य छोटे जानवरों के रूप में आसानी से शिकार भी मिल जाता है। इससे उन्हें जंगल की तुलना में कम संघर्ष करना पड़ता है और वे लंबे समय तक ऐसे क्षेत्रों में ठहरने लगे हैं।
भाखड़ा रेंज के वन क्षेत्राधिकारी नवीन रौतेला ने बताया कि उपनिबंधक को पत्र भेजकर अनुरोध किया गया है कि प्लॉटों की रजिस्ट्री के समय नियमित सफाई सुनिश्चित करने का भी प्रावधान किया जाए, ताकि झाड़ियां न पनपें और वन्यजीवों के छिपने की संभावना कम हो।
बच्चीनगर में शावकों के साथ दिख रहा गुलदार
नैनीताल जिले की भाखड़ा वन रेंज के अंतर्गत बच्चीनगर में पिछले करीब दो महीने से एक मादा गुलदार अपने शावकों के साथ देखी जा रही है। क्षेत्र के खाली प्लॉटों में उगी लंबी झाड़ियों के कारण उसे सुरक्षित ठिकाना मिल गया है और वह रात के समय शिकार के लिए बाहर निकलती है। इसी रेंज के भगवानपुर तल्ला में भी पिछले सप्ताह आबादी के बीच निर्माणाधीन मकान में गुलदार दिखाई दिया था।
गोशालाओं तक पहुंच रहे गुलदार
चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र के मानाढुंगा गांव में पिछले महीने एक गुलदार गोशाला में घुसकर लगभग दो घंटे तक भैंस के पास बैठा रहा। इसी तरह अल्मोड़ा जिले के ज्योली गांव में भी पिछले सप्ताह गोशाला में गुलदार के पहुंचने की घटना सामने आई। विशेषज्ञों के अनुसार, घरों के आसपास उगी झाड़ियां और पर्याप्त आड़ मिलने से ऐसे स्थान गुलदारों के लिए अनुकूल बनते जा रहे हैं।
‘इंसानों के बीच भी रह सकते हैं गुलदार’
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. कमर कुरैशी का कहना है कि जंगलों में गुलदारों की संख्या बढ़ने के साथ ही बाघों का दबाव भी बढ़ा है। ऐसे में आबादी वाले क्षेत्रों में उन्हें झाड़ियां, पानी और भोजन आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि वे इन इलाकों को अपेक्षाकृत सुरक्षित मानने लगे हैं। उन्होंने बताया कि जहां बाघ मानवीय गतिविधियों से दूर रहना पसंद करते हैं, वहीं गुलदार इंसानों के बीच भी छिपकर रहने और खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने में सक्षम होते हैं।
सांकेतिक फ़ोटो :- गुलदार

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