देहरादून। उत्तराखंड में स्वाइन फ्लू यानी एच1एन1 संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश में अब तक कुल 57 मामले सामने आए हैं, जिनमें अकेले देहरादून जिले में 52 मरीज मिले हैं। इसके अलावा नैनीताल में तीन और हरिद्वार में दो मामले सामने आए हैं। प्रदेश के 10 जिलों में अभी तक स्वाइन फ्लू का कोई मामला सामने नहीं आया है।
प्रदेश में सामने आए कुल मामलों में देहरादून की हिस्सेदारी करीब 91.2 प्रतिशत है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि दूसरे जिलों की तुलना में देहरादून में संक्रमण के मामले इतने अधिक क्यों हैं।
एच1एन1 एक श्वसन संक्रमण है, जो संक्रमित व्यक्ति के नजदीकी संपर्क और भीड़भाड़ वाले स्थानों में तेजी से फैल सकता है। स्कूल, कार्यालय, सार्वजनिक परिवहन तथा कम वेंटिलेशन वाले बंद स्थानों में लंबे समय तक रहने से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
देहरादून प्रदेश का प्रमुख शहरी केंद्र होने के कारण यहां स्कूल-कॉलेज, कार्यालय, बाजार और अस्पतालों में लोगों की आवाजाही अधिक रहती है। राजधानी में बड़े सरकारी और निजी अस्पताल तथा चिकित्सा संस्थान भी हैं, जहां दूसरे जिलों से मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में अधिक जांच और बेहतर रिपोर्टिंग भी देहरादून में मामलों की संख्या अधिक सामने आने की एक वजह हो सकती है।
बारिश, नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव के दौरान फ्लू जैसे संक्रमण बढ़ सकते हैं, हालांकि इन्हें संक्रमण का अकेला कारण नहीं माना जा सकता। स्कूलों में संक्रमित बच्चों के माध्यम से वायरस घर तक पहुंचने और फिर परिवार के अन्य सदस्यों में फैलने की आशंका भी रहती है।
एच1एन1 के सामान्य लक्षणों में बुखार, खांसी, गले में खराश, शरीर में दर्द, सिरदर्द और थकान शामिल हो सकते हैं। हालांकि, केवल लक्षणों के आधार पर स्वाइन फ्लू की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए चिकित्सकीय जांच आवश्यक होती है।
स्वास्थ्य विभाग के सामने उठे सवाल
देहरादून में प्रदेश के अधिकांश मामले सामने आने के बाद जांच और सैंपलिंग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यह जानना जरूरी है कि दूसरे जिलों की तुलना में देहरादून में कितने अधिक सैंपल लिए गए हैं। साथ ही 52 संक्रमित मरीजों में कितने स्थानीय हैं और कितने मरीजों की बाहर यात्रा या दूसरे जिलों से संपर्क की हिस्ट्री है।
इसके अलावा जिन 10 जिलों में अब तक कोई मामला सामने नहीं आया है, वहां कितनी सैंपलिंग हुई है, यह भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में शून्य मामलों का मतलब वास्तव में संक्रमण का कम होना है या कम जांच होना, इसकी तस्वीर पर्याप्त सैंपलिंग के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
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