नैनीताल। हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपित पर आरोप तय करने के टिहरी के अतिरिक्त जिला जज (एडीजे) कोर्ट का निर्णय रद कर दिया।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि विवाह से इन्कार करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। जब तक कि सीधे तौर पर उकसाने का कोई साक्ष्य न हो।
यह मामला एक युवती की आत्महत्या से जुड़ा है। मामले में मृतका के पिता ने आत्महत्या के लिए उकसाने की (आइपीसी की धारा 306) प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
जिसमें आरोप लगाया गया था कि टिहरी निवासी शार्दुल नेगी ने उनकी बेटी को परेशान किया। जिससे उसने जनवरी 2021 में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली।
दरअसल नेगी के विवाह से इन्कार करने के बाद युवती और उसके बीच रिश्ते बिगड़ गए थे। नेगी के विरुद्ध जनवरी 2021 में आरोप तय किए गए थे।
अब हाई कोर्ट का निर्णय इस बात की व्याख्या पर आधारित था कि आइपीसी की धारा 306 के तहत “उकसाना” क्या है।
उकसाने का आरोप तभी टिक सकता है, जब इस बात का साक्ष्य हो कि आरोपित ने आत्महत्या के लिए उकसाने में सीधी भूमिका निभाई थी।
नेगी को बरी कर पिछले आरोपों व केस को निरस्त करने का आदेश देते हुए हुए कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय उन आपराधिक मामलों में साक्ष्य के कड़े मानकों की जरूरत की याद दिलाता है, जिनमें किसी को आत्महत्या के लिए विवश करने के आरोप हों।
आरोपित के विरुद्ध आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा में आरोप तय करने का आधार नहीं है।

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