उत्तराखंड ई-मेल, इंतजार और मौत? : पिंजरे में कैद 23 दिन अपनी बेगुनाही का इंतजार की इंतहा बाद गुलदार की मौत, उठे कई सवाल

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देहरादून: सरकारी प्रक्रिया की कागजी औपचारिकताएं पौड़ी में एक गुलदार की जिंदगी पर भारी पड़ गई. गुलदार 23 दिन तक अपनी बेगुनाही के भरोसे रिहाई का इंतजार करता रहा, लेकिन जब इंतजार की इंतहा हो गई तो उसे मौत को गले लगाना पड़ा. हैरत की बात यह है कि अब पत्रचार के जरिए गुलदार की मौत पर जिम्मेदारी पूछी जा रही है और वन मुख्यालय से लेकर डीएफओ कार्यालय तक स्पष्टीकरण के लिए पत्र लिखे गए हैं.

पूरा मामला जानिए: दरअसल, पौड़ी गढ़वाल के बणासी तल्ली क्षेत्र में गुलदार के हमलों से लोग दहशत में थे. मानव क्षति के बाद वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए तीन जुलाई को गुलदार को पिंजरे में पकड़ लिया. इसके बाद उसके नमूने परीक्षण के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजे गए.

बताया जा रहा है कि इस दौरान पिंजरे से निकलने की कोशिश के दौरान गुलदार घायल हो गया था. इसके बाद भी वह घायल अवस्था में ही पिंजरे में रहा. इस दौरान विभागीय स्तर पर भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का इंतजार करता रहा और आखिर में 25 जुलाई को गुलदार ने पिंजरे में ही दम तोड़ दिया. अब इस मौत से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि इसकी जानकारी वन मुख्यालय तक किस माध्यम से और कितनी देर से पहुंची.

23 दिनों तक पिंजरे में कैद रहा गुलदार: इस तरह तीन जुलाई को पकड़े जाने से लेकर 25 जुलाई को मौत होने तक गुलदार करीब 23 दिनों तक पिंजरे में कैद रहा. उसकी मौत ने वन विभाग की उस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें किसी मानव-वन्यजीव संघर्ष के बाद पकड़े गए जानवर के स्वास्थ्य, नमूना परीक्षण और आगे की कार्रवाई के बीच समन्वय बेहद महत्वपूर्ण होता है.

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बड़ा सवाल: सवाल यह है कि तीन जुलाई को गुलदार के पकड़े जाने के बाद उसके नमूने भारतीय वन्यजीव संस्थान भेजे गए थे और रिपोर्ट मिलने के बाद 23 जुलाई को मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय को ई-मेल के जरिए जानकारी दी गई, तो इतने महत्वपूर्ण मामले में फोन या व्हाट्सऐप के जरिए तत्काल सूचना क्यों नहीं दी गई.

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि 23 जुलाई को जब मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय को गुलदार की स्थिति से संबंधित सूचना ई-मेल के जरिए मिल गई थी, तब 25 जुलाई को उसकी मौत होने तक

मुख्यालय स्तर पर क्या कार्रवाई की गई?
क्या गुलदार की स्थिति के बारे में कोई तत्काल निर्देश दिए गए?
क्या उसकी निगरानी या उपचार के संबंध में कोई हस्तक्षेप किया गया?
इन सवालों का जवाब फिलहाल सामने नहीं आया है.
हालांकि अब गुलदार की मौत के मामले में सबसे पहले जिस बिंदु पर जवाबदेही तय करने की कवायद शुरू हुई है, वह है सूचना देने का माध्यम और समय.

पौड़ी के डीएफओ से मांगा गया जवाब: मामले में प्रमुख वन संरक्षक (वन्यजीव) और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय की ओर से पौड़ी के डीएफओ महातिम यादव से स्पष्टीकरण मांगा गया है. उनसे दो दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया है.

स्पष्टीकरण का पत्र मिला है, जिसका समय पर जवाब दे दिया जाएगा. गुलदार की मौत के मामले में दो दिनों के अंदर जवाब देने को कहा गया है.
-महातिम यादव, डीएफओ-

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रिपोर्ट का इंतजार, फिर सूचना को लेकर सवाल: मामले में भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण कड़ी है. गुलदार के नमूने जांच के लिए भेजे गए थे और रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद इसकी जानकारी मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय को दी गई. विभागीय पत्र के अनुसार 23 जुलाई को डीएफओ कार्यालय की ओर से ई-मेल के माध्यम से इस संबंध में जानकारी भेजी गई. यहीं से पूरा मामला एक नए सवाल में बदल गया.

मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि इतने महत्वपूर्ण मामले की जानकारी दूरभाष अथवा व्हाट्सऐप के माध्यम से नहीं दी गई और केवल ई-मेल के माध्यम से सूचना भेजी गई. इसके बाद 25 जुलाई को गुलदार की मौत हो गई. 28 जुलाई को जब इस संबंध में दूरभाष पर जानकारी नहीं देने को लेकर पूछा गया तो पत्र के अनुसार जवाब मिला कि बताने में भूल गया था. यही जवाब अब विभागीय स्पष्टीकरण का आधार बना है.

ई-मेल पहुंचा तो मुख्यालय ने क्या किया?: इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और अनुत्तरित सवाल यही है कि

23 जुलाई को जब मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक कार्यालय को ई-मेल के जरिए सूचना मिल गई थी, तो उसके बाद क्या हुआ?
यदि सूचना ई-मेल के जरिए कार्यालय तक पहुंची थी तो क्या संबंधित अधिकारी ने उसे देखा?

क्या गुलदार की गंभीर स्थिति को देखते हुए पौड़ी वन प्रभाग को कोई निर्देश जारी किए गए?

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क्या गुलदार की हालत के बारे में तत्काल रिपोर्ट मांगी गई?
सबसे अहम, क्या 23 से 25 जुलाई के बीच उसकी स्थिति सुधारने या उसे आवश्यक उपचार उपलब्ध कराने के लिए कोई कदम उठाया गया?

इन सवालों पर फिलहाल विभाग की ओर से कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. इसके बजाय अब तक सामने आई कार्रवाई मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि डीएफओ ने सूचना फोन या व्हाट्सऐप के जरिए क्यों नहीं दी. यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि ई-मेल भी सरकारी संचार का स्थापित माध्यम है.

ऐसे में यदि ई-मेल के जरिए 23 जुलाई को सूचना मुख्यालय तक पहुंच गई थी तो उसके बाद उस सूचना पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी भी जांच जरूरी है. केवल सूचना भेजने के तरीके पर सवाल उठाने से घटनाक्रम की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती. पिंजरे में रखे गए वन्यजीव की स्थिति सामान्य जंगल में मौजूद वन्यजीव से अलग होती है. उसे लगातार निगरानी, स्वास्थ्य परीक्षण और आवश्यकता पड़ने पर उपचार की जरूरत होती है. यदि वह घायल भी हो जाए तो उसकी स्थिति और गंभीर हो जाती है. ऐसे में नमूना जांच की प्रक्रिया और रिपोर्ट आने तक की अवधि में उसकी देखभाल किस स्तर पर हुई, यह भी पूरे मामले की जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए. इस बारे में मीडिया ने वन मंत्री सुबोध उनियाल से भी बात की. उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले का संज्ञान लिया है और इसकी जांच के भी आदेश दिए हैं.

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