“26 साल बाद भी पहाड़ बीमार: डालकन्या करोड़ों का अस्पताल बदहाल, 150 किमी दूर इलाज को मजबूर ग्रामीण”

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भीमताल/ओखलकांडा। उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने को हैं। इस दौरान पहाड़ों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और पलायन रोकने के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन भीमताल विधानसभा के ओखलकांडा ब्लॉक स्थित डालकन्या राजकीय एलोपैथिक चिकित्सालय आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।


करीब 16 ग्राम सभाओं के लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित 36 बेड का यह अस्पताल चिकित्सकों और संसाधनों के अभाव में लगभग निष्क्रिय पड़ा है। देखरेख न होने से भवन जर्जर होता जा रहा है और परिसर झाड़ियों से घिर चुका है।

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डालकन्या, कुंडल, अधौड़ा, डुंगरी, अमजड़, मिडार, सुवाकोट, पोखरी, सलकवार, बसानीधूरा, गलपा, धमौरी, शोभधुंगा, ल्वाड़, डोबा, गोनियारो, हरीशताल, पिंथली, ककोड़, भद्रेठा, पतलोट, देवली, झड़गांव और बड़ौन समेत आसपास के अनेक गांवों के हजारों लोगों के लिए यह अस्पताल महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र बन सकता था। लेकिन पर्याप्त चिकित्सकों और सुविधाओं के अभाव में मरीजों को आज भी इलाज के लिए करीब 150 किलोमीटर दूर हल्द्वानी का रुख करना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल में नियमित चिकित्सकों की तैनाती नहीं है और भवन की वर्षों से मरम्मत भी नहीं कराई गई। इससे करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही है। उनका कहना है कि पहाड़ के गरीब परिवारों के लिए हल्द्वानी तक इलाज के लिए जाना आर्थिक और शारीरिक रूप से बेहद कठिन है।

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एक सप्ताह का अल्टीमेटम, फिर आंदोलन की चेतावनी
ग्राम प्रधान रेखा पनेरू, क्षेत्र पंचायत सदस्य अनीता जोशी, वन पंचायत सरपंच अनीता पनेरू, गोपाल दत्त पनेरू, पूरन चंद्र पनेरू, धर्मानंद पनेरू, बलदेव चौहान, महेश चंद्र पनेरू सहित अन्य ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग और शासन-प्रशासन को एक सप्ताह के भीतर अस्पताल का निरीक्षण कर चिकित्सकों की तैनाती तथा आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि मांग पूरी नहीं होने पर क्षेत्रवासी आंदोलन शुरू करेंगे।

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ग्रामीणों का कहना है कि सरकारें पहाड़ से पलायन रोकने की बात तो करती हैं, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण लोगों का गांवों में रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। उनका कहना है कि यदि करोड़ों रुपये से बने अस्पताल में ही डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो विकास के दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।

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